अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुक्रवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निवास पर प्राइवेट लंच के बाद स्वदेश लौट गये। उनकी चीन यात्रा से कोई बड़ा समझौता या महत्वपूर्ण घोषणा सामने नहीं आई। यात्रा की समाप्ति पर ट्रंप ने शी जिनपिंग के साथ अपनी बातचीत को अत्यन्त सफल और अविस्मरणीय बताया। शी ने इस यात्रा को ऐतिहासिक बताया। 2 दिन तक ली बातचीत में व्यापार, तेल, ईरान और ताइवान पर चर्चा हुई। फॉक्स न्यूज के साथ एक इंटरव्यू में ट्र्ंप ने कहा कि चीन ने ईरान को सैन्य हथियार न देने का वादा किया है और चीन चाहता है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जल्द खुले।
ट्रंप ने कहा कि ईरान को लेकर उनका धैर्य खत्म होने लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान में काफी अंदरूनी कलह है। जिस तीसरे स्तर के साथ हमारी बातचीत हो रही है, वो ज्यादा तर्कशील है और बहुत से मायनों में प्रथन और जूसरे स्तर के लोगों से ज्यादा समझदार है। ट्रंप ने ईरान से फिर अपील की कि वो अमेरिका के साथ जल्द समझौता करे।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर गतिरोध के कारण ट्रंप परेशान लग रहे हैं और वो एक सम्मानजनक रास्त निकालना चाहते हैं। यही वजह थी कि ट्रंप चीन यात्रा पर गए ताकि चीन ईरान पर समझौते के लिए दबाव डाले।
ताइवान के मसले पर चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने ट्रंप को साफ चेतावनी दी, कहा कि अगर अमेरिका ने ताइवान के मामले में टांग अड़ाने की कोशिश की, तो दोनों देशों में जंग छिड़ सकती है, ताइवान का मसला चीन के राष्ट्रहित से जुड़ा है, चीन इसमें किसी की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करेगा, अमेरिका इस बात को समझे। तभी अमेरिका और चीन के रिश्ते अच्छे रहेंगे, अगर अमेरिका, ताइवान को इसी तरह मदद देना और उकसाना जारी रखेगा तो इसका असर बुरा होगा।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फौरन इस पर प्रतिक्रिया दी। रुबियो ने कहा कि अभी तक ताइवान के मसले पर अमेरिका की नीति अपिरवर्तित है, आज बातचीत में ये मसला उठा, चीन हमेशा अपनी तरफ से इस मसले को उठाता है, और हम हमेशा अपना स्टैंड स्पष्ट करते हैं और फिर दूसरे मसलों पर बातें करने लगते हैं।
ट्रंप अपने साथ अमेरिकी उद्योगपतियों का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर गए थे। इसमें टेस्ला के मालिक ईलन मस्क, अनवीडिया के सीइओ जेनसेन हुआंग, एप्पल के सीईओ टीम कुक, बोइंग के सीइओ कैली ऑर्टबर्ग , ब्लैकरॉक के सीइओ लैरी फिंक, क्वॉलकॉम के सीइओ क्रिस्टियानो एमोन, माइक्रोन के सीइओ संजय मेहरोत्रा, सीटीग्रुप की सीइओ जेन फ्रेज़र और अन्य थे। इस यात्रा के दौरान किसी बड़े व्यापारिक समझौते का ऐलान नहीं हुआ।
ट्रंप का मकसद, चीन के साथ बड़ी-बड़ी डील्स करना और फिर स्वदेश जाकर अपने दौरे को कामयाब बताना था। ट्रंप को अप्रैल में चीन जाना था, लेकिन ईरान के साथ युद्ध की वजह से तब दौरा टल गया था। ट्रंप की कोशिश है कि ईरान के साथ डील में चीन उनकी मदद करे। इसके अलावा, वो चाहते हैं कि चीन ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी तेल, गैस, विमान, सोयाबीन वगैरह खरीदे, अपने बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले और अमेरिका को रेयर अर्थ की सप्लाई में ढील दे।
चीन की कोशिश है कि वो टेक्नोलॉजी के सेक्टर में अमेरिका से रियायतें हासिल करे। डोनाल्ड ट्रंप अपने साथ बड़े अमेरिकी उद्योगपतियों को लेकर चीन गए क्योंकि वो चाहते हैं अमेरिकी कंपनियों को चीन से और कारोबार मिले। लेकिन हमारे यहां अगर कोई नेता उद्योगपतियों को अपने साथ लेकर चला जाए तो बहुत हाय-तौबा मचती है। तरह-तरह के सवाल उठाए जाते हैं। ट्रंप के लिए खुलकर बिजनेस की बात करना, अपनी डील सामने रखना कोई मुश्किल काम नहीं है।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है, चीन को ईरान से दूर करना, चीन को ईरान का समर्थन करने से रोकना। लेकिन चीन की एक फितरत है। वो दूसरों के फटे में अपना पैर नहीं डालता। वो मौका देखकर अपनी चाल चलता है। इसलिए ट्रंप को इंतजार करना पड़ेगा। (रजत शर्मा)
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